Akhilesh Yadav Birthday: धूमधाम से मनाया जा रहा अखिलेश यादव का जन्मदिन
पूरे प्रदेश में अखिलेश के जन्मदिन पर केक काटे गए।
लखनऊ। (Akhilesh Yadav Birthday) पूरे देश में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का जन्मदिन धूमधाम से मनाया जा रहा है। पार्टी कार्यकर्ता और नेता सुबह से ही उन्हें बधाई दे रहे हैं। लखनऊ स्थित पार्टी कार्यालय में सुबह से ही कार्यकर्ताओ का तांता लगा हुआ है। पार्टी कार्यालय के बाहर अखिलेश यादव के जन्मदिन के बड़े बड़े होर्डिंग लगाए गए। पूरे प्रदेश में अखिलेश के जन्मदिन पर केक काटे गए। कार्यकर्ताओं ने अखिलेश के जन्मदिन को हर्षोउल्लास के साथ मनाया गया। (Akhilesh Yadav Birthday)
(Akhilesh Yadav Birthday) दिग्गजों को मात दी…टीपू से अखिलेश बनने की पूरी कहानी
राजनीति में कई चेहरे आते हैं और खो जाते हैं। लेकिन, कुछ चेहरे वक्त के साथ खुद को इस तरह तराश लेते हैं कि उनका जिक्र एक मिसाल बन जाता है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आज अपना 52वां जन्मदिन मना रहे हैं।
अखिलेश पहली बार 2012 में यूपी के सीएम बने। लेकिन, 2017 की चुनावी हार और उसके बाद 2018 में पूर्व मुख्यमंत्री के हैसियत से मिले सरकारी आवास से विदाई के वक्त की यादें उनको आज भी कचोटती हैं। घर खाली किया तो उसे गंगाजल से धुलवाया गया।
कई बार वे सार्वजनिक तौर पर अपनी इस पीड़ा को जाहिर करते हुए कह चुके हैं कि क्या मैं अपवित्र था? अखिलेश यादव की राजनीतिक जिंदगी सैफई के खेतों से ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी तक, यूपी के सिंहासन से दिल्ली की संसद तक किस तरह आगे बढ़ी।
अखिलेश यादव का जन्म 1 जुलाई, 1973 को इटावा जिले के सैफई गांव में हुआ। पिता मुलायम सिंह यादव, खुद एक तेजतर्रार नेता थे और राजनीति के शिखर पर विराजमान थे। लेकिन बेटे अखिलेश की परवरिश सिर्फ सत्ता के गलियारों में नहीं, मिलिट्री स्कूल और इंजीनियरिंग लैब में भी हुई।
सैफई से पढ़ाई की शुरुआत करने के बाद वो राजस्थान के धौलपुर मिलिट्री स्कूल गए। इसके बाद उन्होंने कर्नाटक के मैसूर के एक कॉलेज से एनवायरन्मेंटल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन किया। फिर हायर एजुकेशन के लिए ऑस्ट्रेलिया की सिडनी यूनिवर्सिटी गए और मास्टर्स की डिग्री हासिल की। यानी राजनीति में कदम रखने से पहले अखिलेश एक शिक्षित टेक्नोक्रैट की छवि गढ़ चुके थे।
डिंपल यादव से उनकी पहली मुलाकात एक कॉमन फ्रेंड के जरिए हुई। जब पहली बार दोनों मिले, तब अखिलेश इंजीनियरिंग के छात्र थे और डिंपल स्कूल में थीं। दोस्ती गहरी हुई, प्यार पनपा और फिर आया वो वक्त जब ऑस्ट्रेलिया से लौटने के बाद घरवालों ने शादी के लिए दबाव बनाना शुरू किया।
अखिलेश ने घर में डिंपल के लिए बात की, लेकिन मुलायम सिंह नाराज हो गए। जिद ठानी तो टीपू नहीं झुका, बल्कि पिता को मना लिया। 24 नवंबर, 1999 को अखिलेश-डिंपल शादी के बंधन में बंधे। कहते हैं, इस शादी को कराने में अमर सिंह ने अहम किरदार निभाया। टीपू अखिलेश के बचपन का नाम है, जिसे सैफई के प्रधान ने रखा था।
अखिलेश बताते हैं कि सिडनी में एक फैमिली के साथ मैं पेइंग गेस्ट के रूप में रहता था। पति ऑस्ट्रेलियन थे, पत्नी फिजियन। वे अमिताभ बच्चन की शख्सियत से वाकिफ थे। जब अमिताभ बच्चन सिडनी आए, तो मैं उनसे मिलने गया था। वहां के एक अखबार ने मेरी एक तस्वीर छाप दी जिसमें अमर अंकल (अमर सिंह), अमिताभ अंकल (अमिताभ बच्चन) और मैं था। उस दिन से सब जान गए कि मैं कितने बड़े लोगों को जानता हूं।
मास्टर डिग्री लेकर लौटे अखिलेश ने राजनीति को बतौर पेशा नहीं, बल्कि जुनून के तौर पर चुना। साल 2000 में कन्नौज लोकसभा सीट से उपचुनाव जीतकर संसद पहुंचे। वहां उन्होंने खाद्य, नागरिक आपूर्ति और सार्वजनिक वितरण समिति में सदस्य के रूप में काम किया। इसके बाद 2004 और 2009 में भी कन्नौज से सांसद बने।
साल 2012 में अखिलेश ने सपा की चुनावी कमान संभाली। उस वक्त पार्टी की कमान मुलायम सिंह यादव के हाथ में थी, लेकिन रणनीति अखिलेश की थी। वे पार्टी के यूथ के अध्यक्ष थे। उन्हें जिम्मेदारी मिली युवाओं को जोड़ने की, साइकिल को फिर से रफ्तार देने की। सपा को पूर्ण बहुमत मिला। सबको उम्मीद थी कि नेताजी फिर सीएम बनेंगे, लेकिन पार्टी ने सबको चौंकाते हुए 38 साल के अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बना दिया। वह उत्तर प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने।
अखिलेश यादव को सियासत विरासत में मिली। पिता मुलायम सिंह यादव प्रदेश के 3 बार मुख्यमंत्री रहे। मां मालती देवी कुशल गृहिणी थीं। मुलायम सिंह ने 1992 में सपा की स्थापना की और उत्तर प्रदेश की राजनीति में यादव-मुस्लिम के साथ अन्य पिछड़े वर्गों के बीच मजबूत आधार बनाया।
अखिलेश को राजनीति का ककहरा खुद मुलायम सिंह ने सिखाया। 2000 में उपचुनाव से एंट्री कराने के बाद मुलायम सिंह ने अखिलेश को 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव में टिकट दिया, जिसमें उन्होंने जीत हासिल की।
अखिलेश यादव ने 2012 में प्रदेश के सभी जिलों में साइकिल से यात्रा की, जो यूपी की सियासत का टर्निंग पॉइंट भी बनी। मुलायम सिंह ने अखिलेश यादव को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी। 2012 के चुनाव में टिकटों के बंटवारे में अखिलेश यादव ने अहम भूमिका निभाई। माफियाओं को दूर रखा और मायावती सरकार के कुशासन के खिलाफ जनता को एकजुट किया।
उनकी रणनीति में मुफ्त शिक्षा, लैपटॉप, टैबलेट और बेरोजगारी भत्ता जैसे वादे शामिल थे। ये सभी युवाओं और ग्रामीण मतदाताओं को आकर्षित करने में सफल रहे। अखिलेश ने टिकट वितरण में युवा और अपने समर्थकों को प्राथमिकता दी। इसका फायदा यह हुआ कि वह 224 सीटों के साथ सत्ता में आ गए।













